Tuesday, August 29, 2017
खत
"मैं जो हर रोज़ कुछ न कुछ लिखती रहती हूँ यहां,
तुम समझते हो तुम्हे लिखा, वो सोचता है उसको;
तुम समझते हो तुम्हे लिखा, वो सोचता है उसको;
कौन कहता है खत लिखने का ज़माना नहीं रहा..."
-Manali_Aaina
Subscribe to:
Comments (Atom)

