"मैं जो हर रोज़ कुछ न कुछ लिखती रहती हूँ यहां,
तुम समझते हो तुम्हे लिखा, वो सोचता है उसको;
तुम समझते हो तुम्हे लिखा, वो सोचता है उसको;
कौन कहता है खत लिखने का ज़माना नहीं रहा..."
-Manali_Aaina
इंतज़ार लगा था मुसकुराती हुई झुर्रियों में,
पहली मुलाक़ात की ख़ुशी,आंसू न रुके।
बात न कह पाने की बात ही कुछ और है...